SIR, चुनाव आयोग के खुलासे और मतदाता सूची प्रबंधन से जुड़े सवाल
SIR, चुनाव आयोग के खुलासे और मतदाता सूची प्रबंधन से जुड़े सवाल
भारत निर्वाचन आयोग की Special Intensive Revision (SIR) प्रक्रिया के दौरान दर्ज आंतरिक आपत्तियों को लेकर हालिया रिपोर्टों ने फिर से ध्यान आकर्षित किया है। इन आपत्तियों को निर्वाचन आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने दर्ज किया था।
23 सितंबर 2026 को प्रकाशित द इंडियन एक्सप्रेस की एक जांच के अनुसार, दोनों निर्वाचन आयुक्तों ने करीब दस महीनों में कम-से-कम 14 बार मतदाता पंजीकरण, नाम हटाने और बहाली, Form 6, मतदाता डेटाबेस तक पहुंच तथा पश्चिम बंगाल में अपीलों से जुड़े फैसलों और प्रशासनिक कदमों पर औपचारिक आपत्तियां दर्ज कीं। रिपोर्ट के अनुसार ये आपत्तियां आयोग और संबंधित अधिकारियों के समक्ष रखी गई थीं।
निर्वाचन आयोग ने कहा है कि SIR से जुड़े फैसले सर्वसम्मति से लिए गए और आंतरिक सवाल तथा आपत्तियां संस्थागत विचार-विमर्श का हिस्सा थीं। इसलिए मुख्य तथ्यात्मक सवाल यह है कि एक बहु-सदस्यीय संवैधानिक संस्था के भीतर आपत्तियों, निर्णयों और मंजूरियों को किस तरह दर्ज और लागू किया गया।
आपत्तियां किन मुद्दों से जुड़ी थीं
रिपोर्ट की गई आपत्तियां मतदाता सूची प्रशासन के कई पहलुओं से संबंधित हैं।
द इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार, दोनों आयुक्तों ने सवाल उठाए:
नए मतदाताओं के Form 6 से जुड़े बदलावों पर;
ERONet और ECINet प्रणालियों तक वैधानिक चुनावी अधिकारियों की पहुंच पर;
मतदाताओं के नाम हटाने और बहाल करने की प्रक्रिया पर;
मतदाताओं को शामिल करने वाले फैसलों के खिलाफ दायर अपीलों पर; और
निर्वाचन आयोग के नाम से जारी संचार की मंजूरी प्रक्रिया पर।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि दोनों आयुक्तों ने कुछ प्रशासनिक और IT-संबंधी फैसलों के बारे में सवाल उठाया कि क्या उन्हें पूर्ण आयोग की जानकारी या मंजूरी के साथ लिया गया था। ये रिपोर्ट की गई आपत्तियां हैं और अपने आप में यह साबित नहीं करतीं कि कोई चुनावी फैसला कानून के खिलाफ था।
Form 6 और नए मतदाता का सवाल
द इंडियन एक्सप्रेस ने रिपोर्ट किया कि Form 6 में पिछले SIR की मतदाता सूची से जुड़ा एक सवाल जोड़ा गया था। आवेदक से पूछा गया कि उसका अपना नाम या उसके माता-पिता अथवा दादा-दादी का नाम पिछले SIR की मतदाता सूची में था या नहीं।
रिपोर्ट के अनुसार, इस सवाल को औपचारिक रूप से अनिवार्य नहीं बताया गया था, लेकिन ऑनलाइन आवेदन में इसका उत्तर दिए बिना आगे बढ़ना संभव नहीं था।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि विवेक जोशी ने मई में Form 6 में इस तरह बदलाव किए जाने पर सवाल उठाया था और संधू ने भी बाद में इस बदलाव पर आपत्ति दर्ज की।
इससे एक तथ्यात्मक प्रशासनिक प्रश्न सामने आता है: इस बदलाव का औपचारिक कानूनी आधार और मंजूरी क्या थी, और ऑनलाइन प्रणाली में इसे लागू करने की अनुमति किसने दी?
आयोग के रिकॉर्ड यह स्पष्ट कर सकते हैं:
बदलाव को किसने मंजूरी दी;
क्या नियमों में संशोधन की कोई प्रक्रिया शुरू की गई;
बदला हुआ फॉर्म कितने समय तक उपलब्ध रहा; और
उस अवधि में कितने आवेदन जमा हुए।
मतदाता सूची सॉफ्टवेयर की भूमिका
रिपोर्ट की गई आपत्तियों का एक हिस्सा वैधानिक अधिकारियों और मतदाता सूची बनाए रखने वाले सॉफ्टवेयर के बीच संबंध से भी जुड़ा है।
निर्वाचन आयोग की मतदाता सूची प्रक्रिया में ERONet और ECINet जैसे डिजिटल सिस्टम का उपयोग होता है। द इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार, दोनों आयुक्तों ने सवाल उठाया कि क्या राज्य स्तर के वैधानिक अधिकारियों की उपलब्ध पहुंच सीमित की जा रही थी और क्या मतदाता डेटाबेस अधिक केंद्रीकृत हो रहा था।
एक महत्वपूर्ण प्रशासनिक सवाल यह है कि यदि कोई वैधानिक अधिकारी किसी मतदाता को योग्य मानता है, लेकिन सॉफ्टवेयर उस फैसले को दर्ज या लागू करने की सुविधा नहीं देता, तो उस कानूनी निर्णय को कैसे लागू किया जाए?
गोवा का मामला इस सवाल का एक उदाहरण है। रिपोर्ट के अनुसार, Electoral Registration Officers ने 97 मतदाताओं को योग्य माना, लेकिन सॉफ्टवेयर में पहले हटाए गए नामों को वापस करने की सुविधा उपलब्ध नहीं थी। गोवा के मुख्य निर्वाचन अधिकारी के कार्यालय ने 11 से 17 फरवरी के बीच कथित तौर पर आठ बार rollback सुविधा मांगी। रिपोर्ट के अनुसार, ये 97 नाम अंतिम सूची में शामिल नहीं हो सके।
यह घटना जानबूझकर नाम हटाए जाने को साबित नहीं करती। लेकिन यह सवाल जरूर उठाती है कि चुनावी सॉफ्टवेयर में सुधार और बहाली जैसे सभी कानूनी फैसलों को लागू करने के लिए आवश्यक तकनीकी सुविधाएं मौजूद थीं या नहीं।
पश्चिम बंगाल: 38.31 लाख अपील
पश्चिम बंगाल SIR प्रक्रिया का एक प्रमुख केंद्र रहा है।
निर्वाचन आयोग ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि अपीलीय ट्रिब्यूनलों के समक्ष 38.31 लाख अपीलें दायर हुईं। द इंडियन एक्सप्रेस में आयोग के आंकड़ों के अनुसार, 22.21 लाख अपीलें उन मतदाताओं ने दायर कीं जिनके नाम हटाए गए थे और जो पुनः शामिल होने की मांग कर रहे थे। 16.10 लाख अपीलें उन मतदाताओं के खिलाफ थीं जिन्हें शामिल किया गया था और जिनके नाम हटाने की मांग की गई।
उद्धृत रिपोर्ट में आयोग ने यह स्पष्ट नहीं किया कि 16.10 लाख अपीलें किसने दायर की थीं।
सुप्रीम कोर्ट ने इससे पहले SIR प्रक्रिया में “logical discrepancies” के आधार पर चिन्हित लगभग 60.06 लाख मतदाताओं की पात्रता की जांच का निर्देश दिया था। रिपोर्ट किए गए आंकड़ों के अनुसार, न्यायिक अधिकारियों ने 27.16 लाख नाम हटाने का आदेश दिया। इन फैसलों के खिलाफ अपील सुनने के लिए अपीलीय ट्रिब्यूनल बनाए गए।
इतने बड़े आंकड़े प्रक्रिया के पैमाने को दिखाते हैं। साथ ही, यह भी महत्वपूर्ण बनता है कि किसने अपील दायर की, उसका कानूनी आधार क्या था, प्रभावित मतदाता को नोटिस दिया गया या नहीं और उसका परिणाम क्या रहा—इन सभी का रिकॉर्ड उपलब्ध हो।
निर्वाचन आयोग का पक्ष
निर्वाचन आयोग ने कहा है कि SIR से जुड़े फैसले सर्वसम्मति से लिए गए। आयोग ने मतदाता सूची संशोधन प्रक्रिया का बचाव भी किया है और इसे लेकर राजनीतिक आरोपों को खारिज किया है।
द इंडियन एक्सप्रेस ने रिपोर्ट किया कि 23 सितंबर की जांच प्रकाशित होने से पहले 21 सितंबर को भेजे गए प्रश्नावली का आयोग ने जवाब नहीं दिया था।
इसलिए रिपोर्ट में सामने आए आंतरिक रिकॉर्ड और आयोग का सार्वजनिक पक्ष एक ही संस्थागत रिकॉर्ड के दो हिस्से हैं। वास्तविक स्थिति समझने के लिए केवल सार्वजनिक बयानों के बजाय संबंधित फाइलों, बैठकों के रिकॉर्ड, मंजूरियों, पत्राचार और तकनीकी लॉग की जांच आवश्यक होगी।
कौन से रिकॉर्ड तस्वीर साफ कर सकते हैं
कई दस्तावेज इस मामले को तथ्यात्मक रूप से स्पष्ट करने में मदद कर सकते हैं:
संबंधित पूर्ण आयोग बैठकों और फैसलों के रिकॉर्ड।
Form 6 में बदलाव की मंजूरी और उसका कानूनी आधार।
ERONet और ECINet के तकनीकी access और audit logs।
गोवा के कथित rollback मामले के रिकॉर्ड।
पश्चिम बंगाल की 16.10 लाख अपीलों की मंजूरी-श्रृंखला।
नाम हटाए जाने, बहाल होने और अपील के परिणामों के आंकड़े।
निर्वाचन आयुक्तों की लिखित आपत्तियों पर विचार और उनके निपटारे के रिकॉर्ड।
इन रिकॉर्डों के सार्वजनिक होने या स्वतंत्र जांच से यह अलग करना आसान होगा कि कौन-सी बात आंतरिक प्रशासनिक असहमति है, कौन-सी तकनीकी सीमा है और कहीं कानून या निर्धारित प्रक्रिया का उल्लंघन हुआ या नहीं।
बड़ा प्रशासनिक सवाल
मतदाता सूची का संशोधन चुनाव प्रशासन का सामान्य हिस्सा है। निर्वाचन अधिकारियों को मृत, स्थानांतरित, दोहराए गए या अन्यथा अयोग्य प्रविष्टियों से निपटना होता है और साथ ही पात्र मतदाताओं के नाम जोड़ने तथा बहाल करने की व्यवस्था भी रखनी होती है।
इसलिए मौजूदा बहस केवल जोड़े या हटाए गए नामों की संख्या तक सीमित नहीं है। इसमें यह भी शामिल है कि फैसले कैसे दर्ज होते हैं, बदलाव करने का अधिकार किसके पास है, सॉफ्टवेयर उन फैसलों को कैसे लागू करता है और प्रभावित मतदाता उन्हें कैसे चुनौती दे सकता है।
लाखों मतदाताओं के स्तर पर काम करने वाली व्यवस्था में निर्णय की श्रृंखला और तकनीकी audit trail की पारदर्शिता विशेष महत्व रखती है।
मुख्य सवाल सिर्फ यह नहीं है कि अंतिम मतदाता सूची में क्या है। सवाल यह भी है कि प्रत्येक नाम को जोड़ने, हटाने या बहाल करने की प्रक्रिया को स्वतंत्र रूप से समझा और सत्यापित किया जा सकता है या नहीं।

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